यूपी में दो लड़कों की जोड़ी ने दिया भाजपा को तगड़ा झटका, चंद्रशेखर आजाद ने चौंकाया, मायावती का सफाया

यूपी में दो लड़कों की जोड़ी ने दिया भाजपा को तगड़ा झटका, चंद्रशेखर आजाद ने चौंकाया, मायावती का सफाया

मोदी की गारंटी पर भारी पड़ा अखिलेश का पीडीए और कांग्रेस का घोषणा पत्र, राजपूतों की नाराजगी भी एनडीए को पड़ी भारी, मंहगाई-बेरोजगारी का मुद्दा भी रहा प्रभावी
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लखनऊ, जून 4 (TNA) लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में दो लड़कों की जोड़ी ने कमाल करते हुए भाजपा को तगड़ा झटका दिया है। उत्तर प्रदेश में मोदी-योगी पर अखिलेश-राहुल की जोड़ी भारी पड़ गई। इस बार लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने चमत्कारिक प्रदर्शन करते हुए 44 सीटों पर जीत दर्ज करने की ओर अग्रसर है जबकि भाजपा की अगुवाई वाले इंडिया गठबंधन को 27 सीटों का नुकसान उठाना पड़ रहा है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार अमेठी से स्मृति ईरानी, चंदौली से महेंद्र नाथ पांडेय, खीरी से अजय मिश्र टेनी, मुजफ्फरनगर से संजीव बालियान जैसे दिग्गज नेताओं को करारी हार का सामना करना पड़ा है।

यही नहीं अयोध्या में धूम-धड़ाके से श्री रामलला के भव्य मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बावजूद भाजपा फैजाबाद सीट तक नहीं बचा सकी। खास बात यह रही कि जहां आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर आजाद ने नगीना सीट से जीत दर्ज करके सबको चौंकाया है वहीं मायावती की पार्टी बसपा का सूपड़ा पूरी तरह साफ हो गया है।

राम मंदिर और योगी फैक्टर भी उत्तर प्रदेश में भाजपा की जमीन नहीं बचा सका और भगवा ब्रिगेड को राज्य में बड़ा झटका लगा है। नतीजों पर नजर डालें साफ पता चलता है कि मोदी की गारंटी पर अखिलेश का पीडीए और कांग्रेस का घोषणा पत्र भारी पड़ा। इतना ही नहीं एनडीए को राजपूतों की नाराजगी का भी नुकसान उठाना पड़ा। बड़ी संख्या में भाजपा के मौजूदा सांसदों का हारना भी यह साबित कर रहा है कि सत्ता विरोधी लहर का भी कुछ न कुछ असर रहा। साथ ही महंगाई-बेरोजगारी जैसे मुद्दे भी कहीं न कहीं असरदार रहे। नतीजे इस ओर भी संकेत कर रहे हैं कि बसपा का जनाधार खिसककर सपा और कांग्रेस की तरफ गया है। चुनाव के नतीजों ने बसपा के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।

लोकसभा सीटों के लिहाज से उत्तर प्रदेश देश की सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटों वाला राज्य है। इसीलिए माना जाता है कि संसद का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है। भाजपा को अपने बलबूते पर केंद्र में सरकार बनाने का बहुमत न मिलने के पीछे उत्तर प्रदेश में कम हुई सीटों को मुख्य वजह माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का भी आकलन था कि भाजपा को कम से कम 50-60 सीटें मिलना तय है लेकिन जिस तरह के नतीजे आए हैं उसने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक भगवा खेमे में हलचल पैदा कर दी है। जानकारों का मानना है कि चुनाव के नतीजों से सपा का सियासी कदम बढ़ने के साथ-साथ कांग्रेस को भी संजीवनी मिली है। आने वाले समय में कांग्रेस अब यूपी में नए सिरे से जमीन तैयार करने में जुट सकती है।

इस बार लोकसभा चुनाव फैजाबाद और वाराणसी समेत पूरे प्रदेश में स्थानीय मुद्दे भी प्रभावी रहे। फैजाबाद में भाजपा उम्मीदवार लल्लू सिंह की हार और वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महज 1.52 लाख मतों से जीत इस बात का संकेत है। जानकारों का मानना है कि अयोध्या और वाराणसी में विकास के नाम पर जिस तरह से लोगों को विस्थापित किया गया उससे स्थानीय लोगों में नाराजगी है। यह नाराजगी नतीजों में नजर आ रही है।

भाजपा के लिए चुनौती बनकर उभरी सपा

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यूपी में सपा की अगुवाई में ही इंडिया गठबंधन ने जीत का परचम लहराया है। इस बार सपा ने एमवाई (मुसलमान-यादव) से आगे बढ़कर पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) पर फोकस किया जिसका उसे फायदा मिला। इतना ही नहीं टिकट वितरण में यादव के अलावा अन्य पिछड़ी जातियों पर दांव लगाना भी सपा के लिए फायदेमंद साबित हुआ।

साथ ही कांग्रेस के साथ गठबंधन करने का लाभ यह हुआ कि अल्पसंख्यक वोट इंडिया गठबंधन के पक्ष में एकजुट रहा। इस बार सपा ने 62 और कांग्रेस 17 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। सपा ने यादव समुदाय के सिर्फ पांच उम्मीदवार उतारे थे जो मुलायम सिंह यादव परिवार के हैं। बाकी सीटों पर अन्य पिछड़ी जातियों, सामान्य वर्ग तथा मुसलमानों को टिकट दिया गया। माना जा रहा है कि टिकट वितरण में संतुलन भी सपा के लिए मुफीद साबित हुआ।

क्या रही भाजपा का किला दरकने की वजह

मोदी-योगी की जोड़ी उत्तर प्रदेश में भाजपा के किले को महफूज नहीं रख सकी। जैसी कि उम्मीद थी, इस जोड़ी का जादू नहीं चल पाया। अभी तक के रुझानों के मुताबिक एनडीए को यूपी में 25-27 सीटों का घाटा होता नजर आ रहा है जबकि इंडिया गठबंधन के हिस्से में 44 सीटें आती दिखाई दे रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भाजपा ने आक्रमक चुनाव लड़ा था और मोदी और योगी के चेहरे को आगे करके एक बड़ी जीत की उम्मीद लगाए थी लेकिन पूरा खेल उल्टा पड़ गया।

रुझानों से संकेत मिल रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के पीडीए और कांग्रेस के घोषणा पत्र लेकर यूपी में अंडर करंट था जिसका फायदा अखिलेश और राहुल की जोड़ी को मिला। यूपी में भाजपा के पिछड़ने की एक वजह राजपूतों की नाराजगी भी मानी जा रही है। जानकारों का कहना है कि टिकट वितरण में राजपूतों को तरजीह न दिए जाने से एक बड़े वर्ग में नाराजगी थी जिसका असर नतीजों के रूप में सामने आया है। ‘अबकी बार 400 पार’ के नारे को भी भाजपा का खेल बिगाड़ने की एक बड़ी वजह बताया जा रहा है। दरअसल, इंडिया गठबंधन दलितों-पिछड़ों के बीच अभियान चलाकर इस धारणा को मजबूती दी कि भाजपा 400 सीटें लाकर संविधान बदलना और आरक्षण खत्म करना चाहती है। दूसरी तरफ, कांग्रेस के घोषणा पत्र के लुभावने वादों ने भी काफी हद तक मतदाताओं को प्रभावित किया।

फैजाबाद-वाराणसी समेत पूरे प्रदेश में स्थानीय मुद्दे रहे प्रभावी

इस बार लोकसभा चुनाव फैजाबाद और वाराणसी समेत पूरे प्रदेश में स्थानीय मुद्दे भी प्रभावी रहे। फैजाबाद में भाजपा उम्मीदवार लल्लू सिंह की हार और वाराणसी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महज 1.52 लाख मतों से जीत इस बात का संकेत है। जानकारों का मानना है कि अयोध्या और वाराणसी में विकास के नाम पर जिस तरह से लोगों को विस्थापित किया गया उससे स्थानीय लोगों में नाराजगी है। यह नाराजगी नतीजों में नजर आ रही है।

इन दोनों संसदीय क्षेत्रों के अलावा प्रदेश के तमाम अन्य संसदीय क्षेत्रों में सांसदों के कामकाज को लेकर लोगों की नाराजगी भी भाजपा को भारी पड़ी। नेताओं द्वारा पार्टी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा ने भी नतीजों पर असर डाला। 2014 और 2019 के चुनाव के मुकाबले इस बार भाजपा के कार्यकर्ता ज्यादा सक्रिय नहीं नजर आए। यह भी कहा जा सकता है कि अति आत्मविश्वास उत्तर प्रदेश में भाजपा की हार का बड़ा कारण बना।

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